Death of a Cow, and the secular, liberal, tolerant agenda

आज हम फिर वही खड़े है जहाँ कुछ साल पहले थे, जब एक सुप्रसिद्ध अभिनेता ने कहा था की उनकी पत्नी को भारत में असहिषुड्ता के चलते डर लगता है अतः अपने बच्चों के कारण देश से पलायन करना चाहिए। वो तब जब उनको इस देश में अत्त्यन्त प्रेम और सराहना प्राप्त हुई है; पदम् श्री और पदम् भूषण से सम्मानित है वो. और कमाल की बात ये है की इस तथाकथित टिप्पड़ीं से पहले ही उनकी एक लोकप्रिय फिल्म आयी जिसमे एक sequence  में शंकर भगवन की भूमिका निभाता एक पात्र अपनी लंगोट उठाकर पब्लिक टॉयलेट में लघुशंका करते दर्शाया गया, फिर फिल्म के हीरो को देख कर, अपनी क्रिया को आधे में छोड़, त्रिशूल उठाये डर के मारे भागते, लोगों के पैरों की निचे छिपते, भयभीत दर्शाया गया. कमाल की बात ये भी है कि १५० मिनट की इस फिल्म में हिन्दू धर्म पर खुल के आलोचना और कटाक्ष कैसे गए, Organized Religion की कुरीतियों को दिखाने के लिए पर इन श्रीमान के स्वयं के धर्म को २ सेकंड से ज़्यादा नहीं है. कमाल की बात ये भी है इस फिल्म ने भारतवर्ष में ही नहीं विदेश में भी रिकॉर्ड तोड़ पैसे कमाये। वैसे तो इन महान अभिनेता के नाम (और नाम पर फिर हम बाद में आएंगे) से जान सकते है कि ये इस्लाम से ताल्लुक रखते है, पर अपने आप को वो लिबरल सेक्युलर असीम सहिषुड्ता के पैग़म्बर अक्सर साबित करते रहे है. ख़ैर छोड़िए उस किस्से को.
एक बहुचर्चित बहुत लोकप्रिय फिल्म थी – A Wednesday. इस फिल्म में एक पात्र जब नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाये गए किरदार से नाम पूछता है तब नसीरुद्दीन शाह के पात्र कहता है – “नाम में लोग मज़हब ढून्ढ लेते है“. क्या कमाल की लाइन थी ये? और, शायद सारी  फिल्म का दारोमदार बस इसी लाइन पर था. मैं तो नसीरुद्दीन शाह साहब का कायल हूँ, इनकी फिल्म अमूमन अच्छी ही होती है – आज से नहीं ,बल्कि दशकों से. आक्रोश , मंडी , बाजार, मासूम इत्यादि जैसी बेहतरीन फिल्मे की है इन्होने. बेहतरीन फ़नकार है और ये भी पदम् श्री और पदम् भूषण से सम्मानित है. कभी उनके इंटरव्यू पढ़े या सुने तो लगा की शायद काफी संजीदा शक्शियत होगी इनकी।पर हाल में उनके एक टिप्पड़ी से लगा कि कथनी और करनी में फर्क होता है. हम अक्सर पात्रों से प्रभावित होकर फ़नकार को भी वैसा मान लेते है. पर फ़नकार सिर्फ किरदार निभाते है, उसके बाद वो वही है जो वो असल में है. और अगर वो फ़नकार हिंदुस्तान में इस्लाम से ताल्लुक रखने वाला है तब मुझे “अब तकलीफ के साथ कहना पड़ रहा  है” कि तब तो वो बेशक वही है जो असल में वो है – सबको एक मज़हबी चश्मे से देखने वाला इंसान. चाहे वह जितना भी संजीदा या लोकप्रिय क्यों न हो, उसके लिए ये मुल्क  उसका समाज उसके ग़ैर-मज़हबी चाहने वाले सब छोटे है. 
और, जब कभी एक ऐसा समां बनता है जहा उसका, उसके साथियों का well-defined ecosystem ख़तरे में होता है.  या, जब उन हुक्मरान जिनकी छत्रों-छाया में ये well-defined ecosystem पनप रहा था, उनकी गद्दियाँ हिलती सी प्रतीत होती है. तब कई आस्तीन के सांप ऐसे ही हमारे बहुचर्चित फ़नकार, साहित्यकार के ध्वज तले बहुत सी पीड़ा का प्रदर्शन करते हुए प्रलाप शुरू कर देते है की देश तबाही की तरफ जा रहा है. ठंडी सांसे भर कर कहते है कि हमे यहाँ से जाना होगा। और इसका परिणाम वो हमसे कुछ इस तरह चाहते होंगे – “ये तो A Wednesday वाला हीरो है. क्या देशभक्ति  वाली फिल्म थी ” युवा कहेंगे. “ये कह रहा  है तो कुछ बात तो होगी।” पुरानी पीढ़ी वाले कहेंगे, “ये तो वो Akrosh, Bazaar वाला हीरो है. समाज की कुरीति से लड़ा था. ये कह रहा है तो कुछ बात तो होगी।” ये जानते है, कि फिर हम सब विचिलित, भ्रमित हो जाएंगे। समझ नहीं आएगा क्या करे? तेवर बदल देंगे। तेवर के साथ सियासत बदल जाती है और सियासत के साथ सरकार. और काल चक्र रिसेट हो जायेगा।   
पर ये ऐसा क्यों करते है? और एक निश्चित समय पर ही क्यों करते है? वो इसलिए कि जब समिकरण ज़्यादा असंतुलित उनके विर्रुध होता है, या उनका और उनकी आड़ में खड़े लोगों का पलड़ा हल्का होता है, या जब जनता का एक बड़ा हिस्सा कुछ अटपटे सवालों का जवाब उनसे या उनके साथियों से मांगने  के लिए उठ खड़ा होता है तभी ये शास्त्र चलता है. 
सवाल जैसे…    … कि अगर सब आज़ादी तुमको है तो मुझे क्यों नहीं ? … कि तुम मेरे मज़हब पर कटाक्ष कसो , तोड़ मरोड़ के दिखाओ, में पैसे भी दू और हँसू भी, लेकिन मैं तुम्हारे मज़हब पर कुछ न बोलू?… कि तुम्हारे शुभचिंतक एक तरफ मेरे समाज को छोटे छोटे टुकड़ो में बांटे जाये और फिर मुझे ही कहो की  मेरे समाज बड़ा है इसलिए सभी छोटे समाज पर उदारता दिखाओ, सब नज़रअंदाज़ करो, सब सहलो तुम बड़े हो. ऐसा क्यों?… कि मेरी तथाकथित कुरीतियों को ठीक करने का ठेका तुमको, सारे देश को, सारी दुनिया को है पर बाकी समाज पर ऊँगली न उठाओ क्यूंकि वो उनका धरम उनका अधिकार है. वो सब पाक है, ऊपर वाले का दिया फरमान. मेरा भगवान तुम्हारे हिसाब से तो टॉयलेट में सूसू भी नहीं कर पता. ऐसा क्यों ?… कि मेरी ३५००-४००० साल से चल रही परम्पराए, वेद पुराण सब मिथ्या है कोई तथ्य नहीं है, और तुम सब तो historical proven हो?… तुम्हारे मज़हब के आतंकी या देश के गद्दार की दुहाई नन्यायपालिका रातों रात सुन सकती है पर मेरे लिए तारीख पर तारीख?
और फिर मेरे पर ही तोहमत कि  – मैं रुढ़िवादी हूँ. मैं विकृत हूँ. मैं अनपढ़ गवार हूँ बाकि सब सलीक़े वाले है. मैं दंगाई हूँ. मैं क्रोधी हूँ. मैं बद्ज़ात हूँ.  
इसी विचारधारा को एक तमाचे के रूप में नसीरुद्दीन शाह ने बड़ी चतुराई से भरे बाज़ार में हम सब के मुँह जड़ दिया (निचे लिंक है  TOI के interview excerpts का है और एक PARAGRAPH का स्क्रीनशॉट उनके उत्तरों का).

मैं सिर्फ तीन लाइन पर फोकस करूँगा:
1. “I had received religious education as a child” – कहा उनने ये कि “मुझे मज़हबी तालीम मिली है”. पर कहना वो ये चाहते थे कि पर उससे किसी को मतलब नहीं होना चाहिए. क्यूंकि पूर्वधारणा ये है कि मेरी मज़हबी तालीम में ग़लती, रुढ़िवादी विचार की कोई गुंजाईश नहीं है। इसमें ये भी पूर्वधारणा है की मेरे मज़हब लिबरल सेक्युलर और सदा से टॉलरेंट, सहिषुड्ता से भरा है. मुझे दूसरों को रिपोर्ट कार्ड देने का अधिकार है. और इसमें थोड़ी सी भी छेड़-छाड़ करने से, एक भी प्रष्न पूछने से बड़े बड़े धुरंदर कतराते है. 
2. “Ratna (his wife) was from a liberal household so she received next to none” – ये एक बड़ा ही कॉम्प्लिकेटेड वाक्य है था  क्यूंकि इसमें एक साथ कई बातें कह दी गयी. पहली, रत्ना जी ग़ैरमज़हबी है. दूसरा, इसमें ये पूर्वधारणा है कि उस ग़ैर मज़हब की तालीम या सिद्धांत मेरे मज़हब की तालीम से तो ख़राब ही होंगे। तीसरा, वो एक लिबरल परिवार से थी जहाँ उन्हें अपने धर्म की तालीम नहीं दी गयी. यानि, उस परिवार ने अपने धर्म को या तो तिलांजलि देदी थी या फिर ये मान लिया था की उस धर्म को सीखने या जानने से उनकी संतान ख़राब हो सकती है. कुल मिलाकर वो धर्म या उसकी तालीम ख़राब ही होगी. और चौथा, कि क्यूंकि रत्ना जी को उनके परिवार ने उनके धर्म की तालीम नहीं दी इसलिए वो इस विकृत विचारधरा से वंचित रही और मानसिक रूप से सेक्युलर लिबरल और टॉलरेंट बन गयी.      
3. “I did make them learn a few verses from the Quran Sharif, as I believe reciting them improves one’s articulation” – आगे वो यह भी कहते है की उनने और उनकी पत्नी ने अपने बच्चों को कोई मज़हबी तालीम नहीं दी. पर, शाह साहब ने, उनको क़ुरान शरीफ की कुछ आयतें जरूर सिखाई। उसका कारण दिया की इससे उनके बच्चों का प्रॉनन्सीएशन या जोड़बंदी अच्छी होगी। In all fairness, साथ में ये भी कहाँ की जोड़बंदी रामायण या महाभारत के श्लोक पड़ने से भी अच्छी होती है. पर रोचक बात ये है की उनने क़ुरान की ही आयतें सिखाई और उसकी तुष्टि भी की. और फिर उसी को मुद्दा बना कर कहा की उन्हें किसी untoward situation में अपने बच्चों की सलामती का डर लगता है और इसलिए क्रोध आता है. अगर सेक्युलर लिबरल टॉलरेंट होते तो अपने बेटों को रामायण महाभारत के श्लोक भी पढ़ा सकते थे. फिर कहते की मैंने तो भाई सब किया पर देश में डर लगता है तो लोग समझते भी. अर्टिकुलशन का मतलब सिर्फ बोलना का तरीका नहीं, जो बोला जा रहा है उसका भाव भी प्रकट करना होता है। और, उस भाव को तभी प्रकट किया जा सकता है जब ये समझ आये की क्या बोला जा रहा है. वर्ना सिर्फ रट कर बोलने से अगर अर्टिकुलशन ठीक हो जाता तो माता पिता अपने बच्चों को लैटिन की कविताएं भी पढ़ा सकते है. माता पिता अपने बच्चों को अपने धर्म ग्रंथो सिर्फ उनके बोलने के लहज़े को ठीक करने के लिए नहीं बल्कि उनके अंदर अपने मज़हब के पहले आधारशिला रखने के लिए भी पढ़ाते है. ये आदिकाल से चल रही पद्धति है,  आज की नहीं है. और नसीरुद्दीन शाह साहब ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है, बस फर्क ये है की उनने अपने मज़हब की आधारशिला रखी, न कि अपनी पत्नी के धर्म की, जिसको वो घुमा फिरा कर विकृत साबित कर चुके है. 
And this is why through the interview, with the audience, and the section of society he is pandering to, he attempts to take the higher ground. Because he believes in his warped reference frame, that he is morally  and ideologically unassailable.    
तो देवियों और सज्जनों, यक्ष प्रष्न ये है कि कौन है ये सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट?
जनाब!! ये श्रीमान है और इनके इर्द गिर्द घूमने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट  है. इनके साथ उठने बैठने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. सत्ता और विपक्ष में इनके शुभचिंतक, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. कश्मीर के पत्थरबाज़ और उनके नेता, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. विश्यविद्यालों में नक्सली विचारो एवं  देश के टुकड़े की आशा लिए लोग, और उनके अध्यापक सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट  है. दिवाली के पटाख़े, होली के पानी पर ऐतराज़, परन्तु बकरीद पर नालियों में बहते लहू के बीच रोगन जोश उड़ाने वाले सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. सड़क ब्लॉक कर नमाज़ अदा करने और उनको कराने वाले, लेकिन दुर्गा विसर्जन पर आपत्ति करने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. ट्रिपल तलाक पर ना-ना और सबरीमाला पर हाँ-हाँ करने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. पुरानी दिल्ली की गलियों में “its part of the experience” कहते पर बनारस की गलियों में कीचड़ में  मुँह पर रुमाल रखने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. जन गण मन गाना ज़रूरी नहीं है सबके लिए, पर मस्जिद अयोध्या में बनाना ज़रूरी है, ऐसी दलील देने वाले सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. एक आतंकी हमले में मरते एक पिता की अंतिम सांसों में आने वाला चेहरा, वो बेटी कहती है मेरे पिता को दुश्मन ने नहीं युद्ध ने मारा, वो होनहार सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है.  पुश्त-दर-पुश्त तिरुपति देवस्थान के मुख्य पुजारी को निकाले जाने पर चू न करने वाले लेकिन नुक्कड़ की मस्जिद के मौलवी की तकलीफ पर नाक भौ सिकोड़ने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है. बलात्कारी बिशप चाचा का ढ़ोल ताशे के साथ स्वागत करने वाले पर ढोंगी बाबा को तुरंत jail-without-bail चिल्लाने वाले,  सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है.  एक कॉम जिसने सबसे ज़्यादा सपूत सेना को दिये, जिसने कभी अपना माइनॉरिटी होने का झंडा नहीं उठाया, उस कॉम का जनसंहार करने वालो को नेता बना कर परेड कराने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है.  कश्मीरी पंडितों और असम के लोगों की दुर्दषा पर मौन पर रोहिंग्या के दुःख पर रुदन करने वाले, सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है.   और वो सारे लोग जो बंद कमरे में, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सप्प, टीवी और रैलियों में दांत रगड़-रगड़ के ये कहते है, “एक बार सरकार बना लेने दो, तुम्हे देखलेंगे“, वो धमकी देने वाले सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है.और ये सब जानते समझते, “पर मेरा काम तो चल रहा है” सोच कर मौन रहने वाले विभीषण, वो भी  सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है!!   
तो अगर ये सब सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट है, फिर आप और मैं क्या है?
देवियों और सज्जनों, मैं और आप एक भ्रमित बहुमत है. हम वो निर्लज्ज है जिन्हे कभी भारतीय, कभी हिन्दू, कभी भक्त कह कर निचा दिखाया जाता है. हम वो ग़ुलाम है जिन्हें कभी अपनी जात, कभी अपने प्रान्त, कभी अपनी भाषा , या कभी अपने आर्थिक स्तर पर डंडा मारा जाता है   हम ना सेक्युलर है न ही लिबरल है. और हमे असहिषुड् तो सिद्ध कर ही दिया गया है. हम वो है जिनकी सोच सड़ी है, परंपरा झूठी है. भले ही हमने सबको दिल खोलकर अपनाया. सदियों से. हम वो बहुत सारी जातियां है जिसका होना ज़रूरी है एक भोझ ढ़ोने के लिए.  हम वो है जिनके होने से सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट आराम से जी सके, अपने उत्पीड़न का कारण बता सके (जैसे शाह साहब ने किया).हम वो है जिनको दिखाकर सेक्युलर, लिबरल, टॉलरेंट अपने बच्चों को ‘क्या ना बने‘ उसकी सीख दे सके. हम, हम है ही नहीं , ये हमारा होना भी एक मिथ्या.  हम वो “स्टॉकहोल्म सिंड्रोम” पीड़ित है जिनको अपने अस्तित्व का ही विश्वास नहीं और जो बताना चाहे उसको हम शत्रु मान लेते है. हम वो है जो पार्टीज़ में, ऑफिस में, सोशल मिलाप में कुछ तत्वरूप मूल विचारों , प्रश्नो को कहने से कतराते है. क्यूंकि, हम वो है जो अपनी पहचान इन्ही सेक्युलर, लिबरल, और टॉलरेंट लोगों की स्वीकृति में ढूँढ़ते है. हम भारतवर्ष का दुर्भाग्य है. 
पर ये जान कर दुःखी होकर स्वयं को प्रताड़ित हमें नहीं करना चाहिए, न ही हार माननी चहिये. ये हमारी व्यक्तिगत ग़लती नहीं है. कई सदियों से इस अफ़ीम को हमारे ख़ून में डाला जा रहा है – कभी ज़ोर जबरदस्ती से, कभी प्यार-पुचकार कर. कुछ बार शत्रुओं ने, पर हज़ारो बार अपनों ने. भारतवर्ष का इतिहास देख लीजिए ये सेक्युलर, लिबरल, और टॉलरेंट लोग हमेशा रहे है हमारे बीच। बस नाम बदल जाते है.
देवियों और सज्जनों, आलम ये है की अब भी ना चेते तो नस्ल ही ख़राब हो जाएगी. हम, आप, हमारे वंशज वास्तव में सब खच्चर बन कर रह जायेंगे। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। The mind alone is the reason for a one’s bondage and freedom. यही समय की सीख है. 
हमारा कोई शत्रु नहीं है, न ही हम किसे के हक़ का खाना चाहते है. पर कुछ लोग हमारे हक़ का छीन कर दूसरों को खिलाते है और किसी भी इंसान को मुफ्त का खाना अच्छा ही लगता है.  इसलिए तुष्टिकरण और मुफ्त-खोरी की राजनीती का विरोध कीजिये।स्वाधीनता, प्रजातंत्र के साथ साथ सामान्य अधिखार मांगिये। क्रोध से नहीं पर दृढ़ता के साथ कहिये की सम्मान देंगे तो सम्मान लेंगे भी. उदारता दिखाएंगे तो उदारता की अपेक्षा भी करेंगे. अगर हम आपके प्रति संवेदनशील है तो आपसे हमारे प्रति संवेदनशीलता अपेक्षित है.  
अपने इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह साहब बड़े अहंकार के साथ कहते है ये मेरा मुल्क है। जनाब, ये मेरा भी मुल्क है.  

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